150 साल पुराना है ये पंचमुखी हनुमान जी का मंदिर, पाकिस्तान से जुड़ी है इस मंदिर की कहानी

पाकिस्तान वाले हनुमान जी का मंदिर: इस प्राचीन पंचमुखी हनुमान मंदिर को जबलपुर के अर्जी वाले हनुमान जी के नाम से भी पहचाना जाता है। मंदिर में 15 सालों से सेवा कर रहे पुजारी ने बताया कि यहां स्थापित पंचमुखी हनुमान जी की प्रतिमा लगभग 150 साल पहले बनाई गई थी, और इसे पाकिस्तान के कराची से यहां पहुंचाया गया था।

संस्कारधानी के झंडा चौक पर स्थित पंचमुखी हनुमान का विशेष महत्व है। इस स्थान पर स्थापित हनुमान जी की पंचमुखी प्रतिमा को पाकिस्तान के कराची से लाया गया है, जिसे मंदिर करीब 150 साल पहले स्थापित किया गया था। यह मंदिर जबलपुर संस्कारधानी के झंडा चौक पर स्थित है।

इस मंदिर की स्थापना कुशवाहा समाज द्वारा की गई थी और यह कुशवाहा समाज का आत्मविश्वास से संबंधित है। इस मंदिर का प्रबंधन भी कुशवाहा समाज के ट्रस्टीज़ द्वारा किया जाता है। मंदिर में स्थित हनुमान जी की पंचमुखी प्रतिमा को बड़े से बड़े पत्थर पर रचा गया है। इसे अर्जी वाले हनुमान जी के नाम से भी जाना जाता है। यहां से दूर-दूर से भक्त आकर अर्जी लेते हैं और जब उनकी मनोकामना पूरी होती है, तो वे आभारी होकर फिर से मंदिर में सेवा करने के लिए वापस आते हैं।

नर्मदा घाट के द्वारपाल है स्वयं हनुमान जी

गोरीघाट के मुख्य रास्ते की शुरुआत पर स्थित ‘झंडा चौक’ में स्थित एक प्राचीन मंदिर है, जिसे पंचमुखी हनुमान जी का मंदिर कहा जाता है। इसके द्वारपाल हनुमान जी के रूप में बैठे हुए हैं, और यहां के श्रद्धालु विशेष रूप से मां नर्मदा के दर्शन के लिए आते हैं। धार्मिक दृष्टिकोण से, इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को हनुमान जी के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करनी पड़ती है।

इस मंदिर के प्रांगण में, आर्थिक रूप से असहाय कन्याओं के विवाह भी सम्पन्न किए जाते हैं, जिससे सामाजिक उत्थान को बढ़ावा मिलता है। यहां के प्रबंधन द्वारा संचालित इस कार्य के माध्यम से समाज को एकजुट करने और सहायता करने का सुंदर तरीका है। इस रूप में, झंडा चौक पर स्थित पंचमुखी हनुमान जी का मंदिर एक सामाजिक और धार्मिक केन्द्र के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जो कन्याएं आर्थिक रूप से विवाह के लिए सक्षम नहीं हैं, उनका विवाह पंचमुखी हनुमान जी के मंदिर के प्रांगण में पूर्ण विधि-विधान के साथ किया जाता है। कुछ वर्ष पहले, इस प्राचीन मंदिर का एक हिस्सा जर्जर हो गया था, इसलिए उसे तोड़कर कुशवाहा समाज ने इसे पुनः यहां बनवाया। रोजाना, यहां बहुत संख्या में श्रद्धालुओं का संग्रह होता है, और मंगलवार और शनिवार को यहां श्रद्धालु दूर-दूर से पहुंचते हैं।